• Ratan Roy

वे दो प्रकार के लोग कौन हैं? पहला जो वचन को सुनते हैं दूसरा वे जो वचन को सुनकर मानते हैं!

Updated: Aug 11

वे दो प्रकार के लोग कौन हैं? पहला जो वचन को सुनते हैं दूसरा वे जो वचन को सुनकर मानते हैं!





@ पहला जो वचन को मात्र सुनते हैं ::


  1. पवित्रशास्त्र बाइबल के अनुसार वे जो मात्र वचन को सुनते हैं मूर्ख मनुष्य के समान हैं। मत्ती 7:26

  2. और वे ऐसे मनुष्य के समान हैं जिनका घर रेत के ऊपर बना हो।

  3. और जब बारिश, बाढ़, आँधी मतलब इस संसार की चिंता, धन का धोखा, कष्ट या सताव जीवन में आता है तब वे ठोकर खाकर गिर जाते हैं।

  4. उनका जीवन बिना आधार के हैं अर्थात बिना बुनियाद का घर जैसा।

  5. उनका जीवन स्थिर नहीं रहता।

  6. वे पाप में गिरते रहते हैं।

  7. स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता।

  8. अपने आप को मसीह या धर्मी जानकर धोखा देते हैं।

  9. वे धोखे में जीवन जीते हैं। याकूब1:22

  10. उनका जीवन दिखावटी होता हैं

  11. मात्र होंठो से परमेश्वर का आदर करने वाले।

  12. पाप व संसार व शैतान से समझौता का जीवन व्यतीत करने वाले ठहरते हैं। सिर्फ चंगाई, आश्चर्य के काम, सामर्थ के काम और भविष्यवाणी के ही पीछे भागते हैं परंतु वचन की सच्चाई के पीछे नहीं।

  13. वे व्यर्थ अपने आप को ज्ञानी समझते है और घमंड में जीवन जीते हैं।

  14. धन के लाभ के लिए भागते रहते हैं।

  15. भक्ति को कमाई का साधन बना लेते हैं।

  16. फरीसी और सदूकि के समान जीवन हो जाता है।

  17. जीवन आशीष से वंचित रहता है।



@ दूसरा जो वचन को सुनकर मानते हैं और चलते है ::


  1. पवित्रशास्त्र बाइबल के अनुसार वचन को सुनकर मानने वाले बुद्धिमान मनुष्य हैं।

  2. और उनका जीवन चट्टान में स्थित घर के समान हैं।

  3. जो बारिश, बाढ़, आंधी तूफान में भी स्थिर रहता हैं मतलब कष्ट या सताव आने पर भी जीवन स्थिर रहता है।

  4. उनका जीवन का आधार परमेश्वर के चट्टान रूपी वचन पर बना होता है।

  5. उनका जीवन मृत्यु के अंत तक चट्टान के समान रहता है।

  6. पाप का असर समाप्त हो जाता है।

  7. हर दिन स्वभाव परिवर्तित होता रहता है या नया होता रहता है।

  8. परमेश्वर उनको धर्मी रूप में ग्रहण करता है।

  9. अर्थात वे धर्मी है।

  10. उनका जीवन दिखावटी नही होता है।

  11. वे धोखे में जीवन नही जीते।

  12. पाप, संसार, शैतान से समझौता नहीं करते।

  13. वे आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर का आदर करते हैं।

  14. सिर्फ चंगाई और भविष्यवाणी के पीछे नहीं भागते परन्तु सब बातों को परखते हुए ग्रहण करते हैं।

  15. भक्ति और परमेश्वर के भय में जीवन जीते हैं।

  16. परमेश्वर को सदा प्रथम स्थान देते हैं

  17. वह सफल आशीषित और धन्य होता है।



पवित्रशास्त्र से आधारित वचन ::


“जो मेरी ये बातें सुनता और उन पर चलता है, वह उस समझदार मनुष्‍य के सदृश है, जिसने चट्टान पर अपना घर बनवाया था। पानी बरसा, नदियों में बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और वेगपूर्वक उस घर से टकरायीं। तब भी वह घर नहीं ढहा; क्‍योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गयी थी। “जो मेरी ये बातें सुनता है, किन्‍तु उन पर नहीं चलता, वह उस मूर्ख के सदृश है, जिसने बालू पर अपना घर बनवाया। पानी बरसा, नदियों में बाढ़ आयी, आँधियाँ चलीं और उस घर से टकरायीं। वह घर ढह गया और उसका सर्वनाश हो गया।”

मत्ती 7:24‭-‬27 HINDICL-BSI


क्‍योंकि व्‍यवस्‍था के सुनने वाले लोग परमेश्‍वर की दृष्‍टि में धार्मिक नहीं हैं, वरन् व्‍यवस्‍था का पालन करने वाले धार्मिक ठहराए जायेंगे।

रोमियों 2:13


परन्तु वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं। क्योंकि जो कोई वचन का सुननेवाला हो और उस पर चलनेवाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुँह दर्पण में देखता है। इसलिये कि वह अपने आप को देखकर चला जाता और तुरन्त भूल जाता है कि वह कैसा था। पर जो व्यक्‍ति स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपने काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुनकर भूलता नहीं पर वैसा ही काम करता है।

याकूब 1:22‭-‬25 HINDI-BSI


“जब तुम मेरी बात पर नहीं चलते, तो ‘प्रभु! प्रभु!’ कह कर मुझे क्‍यों पुकारते हो? जो मनुष्‍य मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनता तथा उन पर चलता है, वह किसके सदृश है? मैं तुम्‍हें बताता हूँ। वह उस मनुष्‍य के सदृश है, जिसने घर बनाते समय भूमि को गहरा खोदा और उसकी नींव चट्टान पर डाली है। बाढ़ आई और नदी का जल उस मकान से टकराया, किन्‍तु वह उसे ढा नहीं सका; क्‍योंकि वह घर बहुत मजबूत बना था। परन्‍तु जो मेरी बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस मनुष्‍य के सदृश है, जिसने बिना नींव डाले रेत पर अपना घर बनाया है। जब नदी का जल उससे टकराया तो वह ढह गया। उस घर का विनाश भीषण था।”

लूका 6:46‭-‬49 HINDICL-BSI



उसने कहा, “हाँ; परन्तु धन्य वे हैं जो परमेश्‍वर का वचन सुनते और मानते हैं।”

लूका 11:28


“देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ! धन्य है वह, जो इस पुस्तक की भविष्यद्वाणी की बातें मानता है।”

प्रकाशितवाक्य 22:7


जो कोई राज्य का वचन सुनकर नहीं समझता, उसके मन में जो कुछ बोया गया था, उसे वह दुष्‍ट आकर छीन ले जाता है। यह वही है, जो मार्ग के किनारे बोया गया था। और जो पथरीली भूमि पर बोया गया, यह वह है, जो वचन सुनकर तुरन्त आनन्द के साथ मान लेता है। पर अपने में जड़ न रखने के कारण वह थोड़े ही दिन का है, और जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव होता है, तो तुरन्त ठोकर खाता है। जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता। जो अच्छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है; कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना।”

मत्ती 13:19‭-‬23



क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और मेरी बहिन, और मेरी माता है।”

मत्ती 12:50


क्योंकि यदि कोई कुछ न होने पर भी अपने आप को कुछ समझता है, तो अपने आप को धोखा देता है। धोखा न खाओ; परमेश्‍वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा।

गलातियों 6:3‭, ‬7


धोखा न खाना, “बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।”

1 कुरिन्थियों 15:33


जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो।

यूहन्ना 15:14


और जो कुछ हम माँगते हैं, वह हमें उससे मिलता है, क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं और जो उसे भाता है वही करते हैं। जो उसकी आज्ञाओं को मानता है, वह उसमें और वह उन में बना रहता है : और इसी से, अर्थात् उस आत्मा से जो उस ने हमें दिया है, हम जानते हैं कि वह हम में बना रहता है।

1 यूहन्ना 3:22‭, ‬24





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